एक हारे हुए नगर के प्रांगण में आज भीड़ जुटी हुई थी । लकड़ियों का ढेर लगाया जा रहा था और भीड़ प्रतीक्षारत थी एक ऐतिहासिक परीक्षा की .... महिला को लाया गया .....पति , संबंधी , सेवक , दर्शक .. प्रेम क्षोभ भक्ति की प्रतिमूर्ति बने जड़ खड़े थे । लकड़ियों के बीच महिला को स्थापित कर अग्नि प्रज्ज्वलित की गयी । आकाशगामी लपटों का तेज , अग्नि के समक्ष खड़े लोगों के लिए असहनीय था फिर अन्दर ? .... अन्ततोगत्वा परीक्षा संपन्न हुई । महिला की पवित्रता निर्दोष और निष्कलंक प्रमाणित हुई । चारों दिशाओं में विजय उदघोष गुंजार हो उठा ' जय सीता राम '... पति संबंधी सेवक और दर्शक सभी महिला की पवित्रता के प्रति नतमस्तक थे । दूर कही नेपथ्य में वैधव्य श्रृंगार से सजी एक अकेली स्त्री सजल हो चुके नेत्रों को बंद कर के स्मृति बन चुके अपने ' प्रेम ' के प्रति भी श्रृद्धा से नतमस्तक हो रही थी आखिर वह भी तो सफल हुआ था इस परीक्षा में ..... ©
No comments:
Post a Comment