शहर के उस ' अछूत ' मोहल्ले में दिवाली की आतिशबाजी से निकली चिंगारी आग भड़का गयी थी । दमकल के आने तक कईयों के सपनों के आशियाँ राख बन चुके थे । पर हाथ रिक्शा चलाने वाले हरीश को इस आग ने सबसे ज्यादा झुलसाया था । अपनी झुलसे बीबी बेटी बेटे को लिए अस्पताल की तरफ बेतहाशा भागा जा रहा था । इमरजेंसी में डाक्टर को बैठा देख कर उसे ईश्वर प्राप्ति जैसी अनुभूति हुई और हमेशा की तरह धरती के इस ईश्वर ने उसे निराश नहीं किया , हरीश का परिवार अब खतरे से बाहर था । हरीश की आँखों के आंसूओं का कारण अब बदल चूका था डा. के पैर पकड़ कर उन्हें बोला ' साहेब आप आज हमरे खातिर भगवान हुई गए । हमरे जिन्दगी का उजियार ( उजाला ) बचा लीन्ह्यो । ' डा. राजेश उसे उठाने के स्थान पर जड़ खडे थे उन्हें याद आ रहा था कि कैसे पत्नी बच्चों के ' दस साल हो गए इस बार दिवाली साथ मनाईये ' की जिद मानकर वो साहब के पास पहली बार मिठाई लेकर गए थे और साहब ने कहा था ' तुम्हे क्या लगता राजेश तुम गिफ्ट मिठाई नहीं लाते इसलिए तुम्हारी ड्यूटी लगती ? नहीं .... ये मिठाई गिफ्ट लाने वाले ड्यूटी लगने पर क्या लापरवाही करते मुझे पता है .. इसलिए तुम्हे चुनता क्योंकि तुम अपने काम के प्रति ईमानदार हो समर्पित हो ... ' उजाले की विरासत ' हो ... ©
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