Tuesday, November 26, 2013

सुचालक

' दहशत ' मेरा दूसरा नाम है , रोज रिक्शे टैम्पो ऑटो वालों से लेकर भिखारी शराबी भीड़ सब पर निर्बाध बरसता हूँ मैं , बिना किसी सोच संकोच के .... आंसू बहाते रोते लोग , उनके लाल नीले पड़ चुके शरीर  देखकर भी मैं नहीं रुकता .... लगता संवेदना दर्द का कुचालक हूँ मैं .... समझावन निर्दयी निष्ठुर क्रूर न जाने कितने उपनाम थे मेरे । लेकिन उस दिन खुद का मुंह लाल किये मैं दर्द से कांप रहा था . मुझे थामने वाले की गलती आँखों , डूबते दिल से मैं फटा जा रहा था  . शायद मैं सुचालक बन गया था .. बनता भी कैसे नहीं ..आखिर रात के अँधेरे में रेलवे ट्रैक पर मांस के लोथडो में सिमट चुकी इंसानी पहचान को बटोरने में लगा इंसानी दिमाग ' नहीं हमारी खुशबू नहीं हो सकती ये ' से कुरेदा उधेडा जो जा रहा था । - एक डंडे की आत्म कथा से © 

No comments:

Post a Comment