Monday, November 18, 2013

विजय -पराजय

घास मिट्टी पत्थर से बनी बस एक अस्पष्ट और जड़ स्वरूप थी मैं ... उस किशोर की आस्था ने अस्तित्व दिया मुझे , उसके समर्पण लगन ने मुझे स्वरूप और उसके विश्वास ने मुझमे प्राण फूंक दिए और प्रतिफल में उसने स्वयं मुझसे प्राप्त किया एक अद्वितीय कौशल । एक दिन हाथ से रुधिर और नैनो में नीर और ह्रदय में  ' आपका अर्जुन सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बने ' का भाव भरे वो मेरे पास आया , उसके ह्रदय में शोक क्षोभ नहीं वरन ' गुरु दक्षिणा ' सम्पूर्ण कर उपजा विजय का भाव था । पर मैं पराजित थी मेरे मानव स्वरूप ने मुझे प्रतिद्वंदी मानकर मुझसे मेरा शिष्य जो छीन लिया था ... - एक मूर्ति की आत्मकथा से ©

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