विजेता सम्राट की सभा में सिपाहियों से घिरा जंजीरों में जकड़ा वो राजपुरुष अभय मैत्री की याचना करते अन्य राजाओं वीरों को देख रहा था । अमूल्य रत्नों आभूषणों के थाल के थाल जीवन याचना के साथ प्रस्तुत किये जा रहे थे ... पर विजयी सम्राट रत्नों आभूषणों की चमक से उदासीन था ... राजपुरुष को देखकर कुछ बोला जिसे दुभाषिये ने ' राजन आपके साथ क्या व्यवहार किया जाए ? ' कह कर व्यक्त किया । राजपुरुष जो सोंच में था कि ' क्या एक राजा योद्धा के जीवन का मूल्य महज रत्नों आभूषणों में सिमटा है ? याचना में सिमटा है ? स्वाभिमान की अंत्येष्टि में सिमटा है ? ' ने एक पल को अपनी आँखे बंद कर अंतर्मन में झाँका और फिर बोला ' ठीक वैसा जैसा एक योद्धा एक योद्धा के साथ एक राजा एक राजा के साथ करता है ' ..... आज वो विश्व विजयी यवन सम्राट स्वयं मैत्री के लिए उठ खड़ा हुआ था । ढेर लगे रत्नों आभूषणों की चमक को निस्तेज करती राजपुरुष के जाज्वल्यमान ललाट की आभा उसे आकर्षित कर रही थी । अपने देश से हजारों मील दूर उसे आज उसे कोई मिला जो पराजित था मगर योद्धा था जंजीरों में जकड़ा था पर राजा था , क्योंकि वो जीवन का याचक नहीं था । ©
No comments:
Post a Comment