Thursday, November 28, 2013

भीष्म

" ' लेडीज सीट ' है ? चलो खड़े हो जाओ " का तेज स्वर सुनकर वो ऊंघता हुआ युवक खड़ा हो गया । फोन पर ' पितृसत्ता नारीवाद लेख पत्रिका ' बडबडाते हुए वो महिला सीट पर बैठ गयी । ' लखनऊ से नवाबगंज तक खड़े खड़े आया था और अब जो सीट मिली तो ये महिला आ धमकी आज किसका मुंह देखा ' सोच कर किस्मत को कोस कर इयरफोन कानों में ठूंस कर ' तुम ही हो ' में खो गया । न जाने क्यों आज वो ' महिला सीट ' उसे उस अतिमहत्वाकांक्षी प्रेमिका की तरह लग रही थी जो साल में चार बार प्रेमी बदलती है । खैर बस थोड़ा दूर चली ही थी कि एक सज्जन हाईवे से गाँव के मोड़ पर उतरे । बस रुकवाने से लेकर उतरने तक जो हनक उन्होंने दिखाई उससे ' बस गाँव तक क्यों नहीं ले गए ? ' का यक्ष प्रश्न उत्पन्न हो गया था । खैर जाने दीजिये अब सरकारी बस की खाली होती सीट देख कर वो झट से उसपर काबिज हो गया अब किस्मत से गिला शिकवा काफूर हो चूका था खुश तो ऐसा था जैसे सरकारी बस की सीट नहीं सरकारी नौकरी मिल गयी हो । उन्नाव के पहले एक पति पत्नी चढ़े , भरी बस देख कर उन्होंने ऐसा मुंह बनाया जैसे तीसरी बार ' लड़की ' हुई हो । काफी देर खड़े रहे । पति ( पुरुष ) को कोई सीट दे ऐसा होना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था पर गर्भवती पत्नी ( महिला ) को भी अब तक स्थान नहीं मिला .... शायद सब व्यस्त थे कुछ मोदी राहुल केजरीवाल गाने में कुछ सोने में कुछ खाने में और वो माहिला सीट वाली महिला ' नारीवाद पितृसत्ता लेख पत्रिका ' का अचार डालने में ...ये सब देख. युवक का विवेक अब कृष्ण बन चूका था और शरीर अर्जुन बन खड़ा होने वाला ही था पर तब तक कंडेक्टर भीष्म बन महिला के लिए सीट छोड़ चूका था । आज कृष्ण फिर ' भीष्म ' के प्रति नतमस्तक थे । ©

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