Sunday, December 1, 2013

आकार में बड़ा था पर उसका होने की आकांक्षा भी प्रबल थी , इसलिए अपना आकार बदलने को तैय्यार हो छोटे छोट टुकड़ों में बंटना था मुझे .... प्रतिबद्धता समर्पण की तेज धार ने क्षण भर में मुझे टुकड़े टुकड़े कर दिया ...शायद उसने समझ लिया मेरे दर्द को इसीलिये झट से मुझ कटे फटे को अपने निश्छल निर्दोष आवरण से ढक लिया और मेरे छोटे छोटे टुकड़ों का आकार ले लिया ... जो शायद उसकी स्वीकारोक्ति थी ... और समर्पण में उस खौलती कढाही में मुझ तक कम तपिश आये इसलिए वो जलती रही भुनती रही । अब ये प्रेम की पवित्रता ही थी कि जब हम कढ़ाही से निकले तो ' कुंदन ' से दमक रहे थे । ...... ये अलग बात है कि ज़माने ने हमसे सीखा नहीं बस चटखारे ही लिए .... - आलू के पकोडों की आत्मकथा से © 

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