हिन्दी साहित्य में गजब रूचि थी बन्दे की , प्रेरणादायक कविता ख़ास तौर से ' कोशिश करने वालों की हार नहीं होती है ' तो श्री मुख से ऐसे निकलती थीं जैसे प्लेटफार्म पर ' चाय गरम चाय ' का स्वर ... बी.ए. हिन्दी फर्स्ट इयर की बात है ... नीली साईकिल वाली लड़की पर दिल आ गया पर कहने मे डरे ... गर्मी में ताल पोखरे सूख जाते वैसे ही आत्म विश्वास सूख जाए .... दोस्त के काम दोस्त न आये ऐसा हो सकता है भला ... आत्म विश्वास प्रेम की महानता के झाड पर चढ़ा कर ' कोशिश करने वालों की हार नहीं होती है ' का इंजेक्शन लगाया हमने तो बन्दे में आत्म विश्वास बरसात में शहर में भरे पानी की तरफ उफनाने लगा .... ' हे पिकबयनी हे मृगनयनी ' घोट कर पीगया बंदा , खुश इतना कि ऐसा लगने लगा कि ये मुस्कराहट महानगर की स्ट्रीट लाईट की तरह अब शायद कभी न बंद हो ... अगले दिन हिन्दी की क्लास नहीं आया बाहर मिला तो चेहरे की रोशनी ऐसे गायब जैसे मंत्री आने के बाद एक महीने तक गाँव में बत्ती न आई हो ... बहुत पूंछने पर बोला हमारी समझ में आ गया कि कोशिश करने वालो की न हार होती है न लड़की .. मार होती है , वो नीली साईकिल जीव विज्ञान वाली थी पिकबयनी मृगनयनी सुनते ही ' रसीद ' दे दी ... ©
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