मैं कैसे अस्तित्व में आया ये कोई लम्बी महान और बड़ी कहानी नहीं है और न ही किसी प्रसव काल से जुडी , दो भिन्न व्यक्तित्वों शरीरों आत्माओं को स्वयं में समिष्ट किये मुझे आगे बढ़ना था , पर वो होता है न आपके प्रशंसक आलोचक दोनों ही मैदान में होते हैं , मेरे भी थे । अब मुझ पर बोझ बढ़ाया जा रहा था आलोचक ढोना चाहते थे मुझ पर अपनी परम्पराओं प्रतिष्ठाओं को तो प्रशंसक महानताओं को अपेक्षाओं को ...मैं अब रेंगते हुए बढ़ रहा था लेकिन वो हार गया , वो तड़प कर रह गयी , और मुझे बे मौत मरना पड़ा । अब मेरे नसीब में बस दोनों के आंसू रूपी कफ़न था जिसे उन्होंने ' दोस्ती ( lets remain friends ) ' का नाम दे दिया ..... - ' ढाई अक्षर की लाश ' आत्म कथा से ©
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