Tuesday, December 3, 2013

जुबाँ

भाई साहब के यहाँ जाना हो रहा था , उस बड़ी सी मिठाई की दूकान से मिठाई ली फिर कुछ फल लिए और जब वापस रिक्शे के पास आया तो रिक्शे वाला दूकान के काउंटर पर सजी जलेबियां इमरती गुलाब जामुन देख रहा था ...उसे टोंका नहीं  ... आँखे अगर आशिकों के लिये दिल की जुबाँ होती हैं तो गरीब के लिए पेट की .... ज़रा सी देर बाद मुझे पास भांप कर वो मुस्कुराकर बोला ' चलें बाबू जी ' ... घर आकर बीस के नोट के साथ चार बालूशाही भी निकाल कर दे दीं । ...... और अन्दर '  एक किलो भी नहीं लाये ' के टांट का जवाब ' भाभी मंदिर से चढ़ा कर लाया हूँ  ' के  खिलखिलाते हुए झूठ ने दे दिया । ©

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