भूमिका - बस पांच मिनट और दूध गर्म कर लूं ..
यतिन - तुम्हे भी दूध वुध सब अभी गर्म करने की पडी थी ,
6:10 हो गया 6:30 पे पहुंचना है , रास्ते में भी 30 मिनट्स लगेंगे
भूमिका - अरे वंश के लिए कर रही बाबा... माँ भी नहीं हैं और मेड ... न बाबा न
उसके भरोसे छोड़ के वो भी शाम को बिल्कुल नहीं
यतिन - बार बार माँ नहीं इसलिए दिक्कत हो रही मत जताओ ...
और बोटेल में दूध का तो मना किया था सबने ...
भूमिका - तुम्हारी पार्टी कम बिजनेस गैदरिंग ,
ड्रेस कोड में बिजनेस सूट ... कहाँ कैसे उसे सबके सामने दूध पिला
पाऊँगी .. बोलो
यतिन - ( उसकी बात अनसुनी करते हुए ) अच्छा अब जल्दी तो कर लो , मेरी हर ... ( कुछ बुदबुदाहट ) ....
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यतिन - रिवर व्यू होटल ले चलो रमेश ...
सुनो बाईपास से ले चलना शायद आज जैम न लगा हो
रमेश ( 50-70 मीटर चलने के बाद ) - नहीं लगा होगा सर ...
यतिन - क्या ? कैसे नहीं लगा होगा ?
रमेश - जाम नहीं मिलेगा सर वो देखिये बच्चे को दूध पिलाती गाय ...
शगुन होता ये .... ©
.............कब यहां अमर विस्वास , अमिट है कब आस्था ? बस एक शून्य जिसमें होता सब कुछ विलीन , आबद्ध परिस्थिति - मनोवृत्ति की सीमा से , मै जो लिखता वह सब कितना अर्थहीन !
Friday, January 10, 2014
शगुन
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लघुकथा
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