-नमस्ते भाई साहब ... हैप्पी मकर संक्रांति
-आपको भी मिसेज सिंह
-ये लीजिये लड्डू खाईये
-अरे वाह शुभकामनाओं के साथ लड्डू भी हैं ... ( खाते हुए ) स्वादिष्ट भी है ...
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-बड़ी जल्दी आगये आप मंदिर से ....
-हां थोड़ी देर हो गयी मिसेज सिंह मिल गईं थी रास्ते में ये लो लड्डू भी दिए
-आप तो पक्के उपरहिता बाह्मन निकले ... गए थे मंदिर खिचडी चढाने और दान में लड्डू ले आये
-अरे वो ... खा के देखो स्वादिष्ट ....
-स्वादिष्ट .... मैं तो जैसे कच्चा जला ही खिलाती आई आज तक ... तुम्ही खाओ ये दान के लड्डू ( चली जाती है )
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एक घंटे बाद :-
सुनिए ये लीजिये खिचड़ी ... आपकी पसंदीदा अमरूद की चटनी , तिल की गजक और लड्डू ... गरम ही खा लीजियेगा .. हम धुप लेने जा रहे
( जाते ही )
- ( बुदबुदाते हुए ) औरतें भी बहुमुखी प्रतिभा की धनी होती ... तिल का ताड़ और तिल के लड्डू दोनों बना लेतीं
- मम्मी S s s s ...
- मम्मी की संतान चुप हो जा . पतंग नहीं चाहिए क्या ? ले लड्डू खा ... ©
.............कब यहां अमर विस्वास , अमिट है कब आस्था ? बस एक शून्य जिसमें होता सब कुछ विलीन , आबद्ध परिस्थिति - मनोवृत्ति की सीमा से , मै जो लिखता वह सब कितना अर्थहीन !
Tuesday, January 14, 2014
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