.............कब यहां अमर विस्वास , अमिट है कब आस्था ? बस एक शून्य जिसमें होता सब कुछ विलीन , आबद्ध परिस्थिति - मनोवृत्ति की सीमा से , मै जो लिखता वह सब कितना अर्थहीन !
खिचडी बट रही थी लम्बी लाइन लगी थी , झमाझम पानी बरस गया .... अब वहां वो क्रासिंग के पास रहने वाला कबाड़ी बूढा ही खड़ा था बस .. ©
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