शहर के वीरान कोने में हनुमान जी का वो छोटा सा मंदिर था , कहते है द्वापर कालीन था ... मंगल शनिचर को छोड़ कर भूले भटके ही कोई पहुँचता था वहां ... पर जब भी जाओ तीन लोग हमेशा मिलते 70 साल का वो बूढा पुजारी और मंदिर के बाहर टाफी कैंडी के जार में बंद भुने चने इलाईची दाने बतासे अगरबत्ती लिए घास फूस की मड़िया बनाये ' राम आसरे ' ... और जीर्ण शीर्ण होते मंदिर में बैठे प्रफुल्लित तेजपूर्ण हनुमान जी । बगल में बहती नदी हरे भरे वृक्ष चहचहाते पक्षी पुष्प सुगंध प्रष्फुरित करती शीतल वायु.. प्राकृतिक स्थान का आकर्षण / सौन्दर्य कहिये या भक्ति की प्रबलता पर स्थान दिव्य लगता । फिर एक दिन नव नियुक्त मंत्री जी आये ... मंदिर का जीर्णोद्धार हो गया , मिट्टी के चबूतरे पक्के हो गए , बाउंड्री वाल बन गयी , पेड़ कटके टीन शेड लग गए , खेतों में पार्क बन गए , नदी में बोटिंग शुरू हो गयी पंक्षियों की चहचहाट रिंगटोन से बदल गयी और ' राम आसरे ' की मड़िया को हटा कर पक्की दूकाने बन गईं जिनमे प्रसाद से लेकर सिगरेट कोल्ड ड्रिंक सब मिलता ... अब वहां बहुत भीड़ लगती .. लेकिन न अब वो बूढा पुजारी है न राम आसरे पर हनुमान जी हैं कहते हैं उनकी मूर्ति सिद्ध है ... आँखों से आंसू आज भी निकल पड़ते है ...... ©
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