दो से चार , चार से आठ , आठ से सोलह और सोलह से बत्तीस होने क्रम में सड़क किनारे मजमा जुट रहा था । भीड़ में चेहरों पर हंसी , शालीनता सोच संवेदना की जमानत जब्त कर रही थी । अन्दर से आ रही क्रंदन चीख की आवाज सुनकर किनारे खड़े एक जनाब से पूंछा - क्या हो गया भाई साहब ? .. उनके पान चबाते हुए बोलने के कारण ' लौंडा लौंडिया ... भाग .. धुलाई ' इतना ही समझ आया पर ' पिच्च ' से थूकी पीक अन्दर रक्त रंजित हो चुके प्रेम को अच्छे से व्यक्त कर गयी थी । .. ©
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