" . . . ' शहर में जिसके यहाँ जाओ ' चाय चलेगी ? ' पूंछते , पर गांव में सीधे आदेश देते ' रोटी खाके जाना बेटा । अब सोमेश की समझ में आ गया था कि क्यों कहते शहर की अमीरी से गाँव की गरीबी भली । " गल चुके अखबार में छपी सप्ताह की सबसे श्रेष्ठ , पुरुस्कृत इस लघुकथा का अस्तित्व भी मिट चुका था । पर समझ ये नहीं आया कि दो जून रोटी की तलाश में शहर आया वो शक्स तो अनपढ़ था फिर स्याही के अस्तित्व को किसने चुनौती दी । क्या अखबार में लिपटी उन 2 अधपकी पसीजती रोटियों ने ? ... - कौशल 01-02-2014 ©
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