जिस घाव को लोग आंसू संवेदनाओं और शुभेच्छाओं से भरने का प्रयास कर रहे थे उसको उसने क्लीनर से डूबी रूई घुसेड़ कर पाशविक निर्दयता से रगड़ दिया .. और सावधानी से चीख को अनदेखा करते हुए उसमे दवा उड़ेल कर घाव को लपेट दिया .. दर्द से बिलबिलाई उस देह को वो आघात करने वाले से भी क्रूर लगा । पर कुछ देर बाद उसके कंधे के सहारे बढाया एक एक कदम ड्रेसिंग रूम में उपजे शत्रुत्व के भाव को पग पग पीछे छोड़ रहा था .... - एक समालोचक की डायरी से ©
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