Monday, February 17, 2014

जिस घाव को लोग आंसू संवेदनाओं और शुभेच्छाओं से भरने का प्रयास कर रहे थे उसको उसने क्लीनर से डूबी रूई घुसेड़ कर पाशविक निर्दयता से रगड़ दिया .. और सावधानी से चीख को अनदेखा करते हुए उसमे दवा उड़ेल कर घाव को लपेट दिया ..  दर्द से बिलबिलाई उस देह को वो आघात करने वाले से भी क्रूर लगा ।  पर कुछ देर बाद उसके कंधे के सहारे बढाया एक एक कदम ड्रेसिंग रूम में उपजे शत्रुत्व के भाव को पग पग पीछे छोड़ रहा था .... - एक समालोचक की डायरी से  ©

No comments:

Post a Comment