वो छोड़ के क्या गयी कि वो उजड़ गया ऐसा उजड़ा कि ज़िन्दगी के बसाये नही बसा । फिर एक दिन आख़िरी प्रयास में दोस्त ने सब अरेंज कर उसे उस बंद कमरे में भेज दिया । शराब का नशा , पारदर्शक कपड़ों में छिपी उस मादक काया के उत्तेजक आमंत्रण , विचालित होने से न बच पाया , आवरण मुक्त हो वासना के झंझावातों में घिरा उन्माद के अंतिम क्षणों में उसके मुंह से बस वही चिर परिचित ' किसी का ' नाम निकला ... फिर अपने मसले जा चुके शरीर से बेपरवाह , इस सब की आदतन उस मादक काया ने अपनी मुठ्ठियाँ कस लीं , दांत भींच लिए , आँखे बंद कर लीं लेकिन चेहरा सफ़ेद पड़ने लगा ...बंद पलको के कोनों से रिसता समंदर उसकी चुगली कर रहा था । आखिर आज वो फिर एक जिन्दा कब्रिस्तान बन गयी जिसमे किसी का प्यार दफ़न था । - © कौशल
.............कब यहां अमर विस्वास , अमिट है कब आस्था ? बस एक शून्य जिसमें होता सब कुछ विलीन , आबद्ध परिस्थिति - मनोवृत्ति की सीमा से , मै जो लिखता वह सब कितना अर्थहीन !
Thursday, March 6, 2014
वेश्या
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लघुकथा
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