Thursday, March 6, 2014

वेश्या


वो छोड़ के क्या गयी कि वो  उजड़ गया  ऐसा उजड़ा कि ज़िन्दगी के बसाये  नही बसा । फिर एक दिन आख़िरी प्रयास में दोस्त ने सब अरेंज कर उसे उस बंद कमरे में भेज दिया । शराब का नशा , पारदर्शक कपड़ों में छिपी उस मादक काया के उत्तेजक आमंत्रण , विचालित होने से न बच पाया , आवरण मुक्त हो वासना के झंझावातों में घिरा उन्माद के अंतिम क्षणों में उसके मुंह से बस वही  चिर परिचित  ' किसी का ' नाम निकला ... फिर अपने मसले जा चुके शरीर से बेपरवाह , इस सब की आदतन उस मादक काया ने अपनी मुठ्ठियाँ कस लीं , दांत भींच लिए , आँखे बंद कर लीं लेकिन चेहरा सफ़ेद पड़ने लगा ...बंद पलको के कोनों से रिसता समंदर उसकी चुगली कर रहा था  । आखिर आज वो फिर एक जिन्दा कब्रिस्तान बन गयी जिसमे किसी का प्यार दफ़न था । - © कौशल

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