6-7 साल की देह को आज थोड़ी साफ़ और सिली चिरकोटी पहनने को मिल रही थी । आज जमीदार के यहाँ बरसी पर दस गाँव भोज था , बापू और बड़के दादा को दूसरा काम है इसलिए ' नन्हे ' और माँ जायेंगे । आज पहली बार नन्हे को ऐसी दावत देखने का अवसर मिला था तो बहुत खुश था । चलने को हुए तो माँ ने इसे एक डंडा पकड़ा दिया और उत्सुकता भरे प्रश्न ' ई काहे अम्मा ? ' को अनसुना कर हाथ थाम कर तेजी से आगे बढ़ गयी । ज़मीदार का आहाता दिखना शुरू नहीं हुआ था पर खाने की खुसबू आ रही थी , बाल चपलता को थाम पाना अब माँ के लिए मुश्किल होता जा रहा था ... खैर अब दोनों माँ बेटा अब जूठी पत्तलो , टूटे कुल्हड़ों के ढेर के पास खड़े थे , माँ जल्दी जल्दी अध खाई पूड़ियाँ और ना पसंद आई सब्जी बटोर रही थी ... तभी टूटे कुल्हड़ो में बची खीर को आकर कुत्ते चाटने लगे ' ठाड़ काहे हा .. भगा इनका .. यही के मारे तो डंडा दीन रहै ' ....
( एक जीवनी में पढी घटना पर आधारित )
.............कब यहां अमर विस्वास , अमिट है कब आस्था ? बस एक शून्य जिसमें होता सब कुछ विलीन , आबद्ध परिस्थिति - मनोवृत्ति की सीमा से , मै जो लिखता वह सब कितना अर्थहीन !
Monday, September 15, 2014
दस गाँव भोज
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लघुकथा
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