Tuesday, September 23, 2014

एक और कविता

अँधेरे गहरे कुएं में
बाल्टी गिरती है
और गूंजती है
छपाक की आवाज !
फिर
खीचना पड़ता है
जिसे पूरे जतन से
निकालने को
एक और अदद भरी बाल्टी

बस बिलकुल इसी तरह
ह्रदय के कुँए में
गूँज उठता है
तुम्हारा नाम
फिसलती साँसों को जकड़ कर
खीचता हूँ
ताकि निकल सके
एक और दिन । - ब्रह्म राक्षस ©

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