उस दिन ये कालेज से जल्दी घर आ गया , एकांत निजता को पूरी तरह सुनिश्चित करने के बाद इसने अखबार के गड्ड के सबसे नीचे वाले अखबार में छिपी वो पत्रिका निकाली । माथे पर पसीना , चेहरे पर खिलती मुस्कान , दिल की धड़कन और पलटते पन्नो में गजब का सामंजस्य बिठाते हुए फोन पर कन्फर्म किया ' तीन बजे आओगी न ? ' .... ' हाँ और .. ' जवाब पूरा सुने बिना ही इसने फोन काट दिया । अब पूरा समय था इसके पास , मेरे साथ अपने काम में जुट गया , चूंकि पहली बार ये सब कर रहा था इसलिए गजब का नर्वस था , बार बार पसीना पोछता कांपते हाथों से इसने बहुत कुछ किया , पर अति उत्साह अनुभवहीनता ने बेमेल नमक चीनी मसालों का रूप ले रखा था , लेकिन हम जानते थे जिसका जन्म दिन है उसे ये सब नहीं खलेगा , बेजान कहे जाने वाले हम जब खुद में उड़ेले ' प्यार ' को चख पा रहे तो फिर वो तो इसकी ' माँ ' है । - कढाही की आत्मकथा © - ब्रह्म राक्षस
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