Sunday, July 6, 2014

जवाब

उस छोटे कस्बे से इस बडे महानगर मे आई मां बिल्कुल भी नहीं बदली थी । स्टेशन , मंदिर या बाजार हर जगह फ़ैलने वाले खाली हाथ मे कुछ न कुछ डाल देती । आखिर बेटे ने मां से कह ही दिया ’ अरे मां ये शहर है , ये सब हाथ इसलिये नहीं फ़ैलाते क्योंकि ये मजबूर हैं , जरूरतमंद हैं , ये तो इनका काम – धंधा  है , व्यापार है  … है न पिताजी ? “ बदले में मां की सदाबहार झिडक तो समझ गया पर पिताजी की मुस्कान सवाल बन के रह जाती .. अगर अगले दिन पिता के साथ कार में सफ़र करते हुये उनके एक सवाल पर खुद के दिये इस जवाब  “ पिताजी सडक पर कौन सा गड्ढा कितना गहरा है पानी भरा होने की वजह से पता नहीं चलता इसलिये हर बार धीमी कर के सावधानी बरत रहा हूं “ पर उन्हे फ़िर से उसी तरह मुस्कुराता हुआ न पाता ।  - © ब्रह्म राक्षस ( कौशल ) 

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