मंदिर जाते समय गाँव से गुजरते एक रास्ते पर .. 3-4 साल की उमर
होगी , बिखरे बाल , कपड़ों के नाम पर मैले कुचैले चीथड़े , और एक
चोटिल हाथ जिस पर ढंग का प्लास्टर भी नहीं था । बीच सड़क
पर अपनी बहन के साथ चलते चलते अचानक बाईं तरफ भागा पर बाईक
देख कर फिर दाएं को पलटा... मेरी जान सूख गयी .. आम तौर पर
60- 70 चलने वाला मैं 50 पर चल रहा था पर तब भी क्लिच गियर
ब्रेक के सारे संयोजन पूरे नियंत्रण , तत्परता और शक्ति के साथ करने
पड़े ... अब वो मासूम गाडी के बिलकुल सामने हाथ में खाने
वाला पीला पीला ' पोंगा ' थामे तकरीबन 3-4 फीट दूर दहशत
से गिरा पड़ा था ... क्या हुआ एक पल को कुछ समझ न आया फिर
पीछे से पिलियन की क्रोध भरी आवाज आना और उसका सहमते
डरते हुए भाग खड़ा होना ... ये सुनिश्चित कर रहा था कि ' मैं
अभी जिन्दा हूँ '... - © ब्रह्म राक्षस
.............कब यहां अमर विस्वास , अमिट है कब आस्था ? बस एक शून्य जिसमें होता सब कुछ विलीन , आबद्ध परिस्थिति - मनोवृत्ति की सीमा से , मै जो लिखता वह सब कितना अर्थहीन !
Wednesday, August 27, 2014
जिन्दा
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लघुकथा
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