कानपुर जाने को खड़ी बस में वो 18-19 वर्ष का तरुण युवक चढ़ा , बस भरी नहीं थी पर अधिकतर सवारियां आगे और खिड़की पर काबिज थीं । अक्सर आता जाता रहता इसलिए जानता था कि ज्यादा पीछे बैठना शरीर के लिए असमय बुढापे का अनुभव कराने जैसा होगा । ठीक कंडेकटर की सीट के पीछे खाली सीट जिसमे मात्र 35-36 वर्ष का एक प्रौढ़ युवक बैठा था बैठने को हुआ ही था कि प्रौढ़ युवक बोला ' खाली नहीं है ' । प्रौढ़ युवक के मौन और तरेरती आँखों से ' कोई बैठा है क्या ? ' का जवाब पाकर वो तरुण युवक सहज भाव से पीछे की सीट पर चला गया । सीट पाने के बाद रास्ते के लिये कुछ खाने का प्रबंध करने हेतु नीचे उतरने के दौरान अनायास ही उसके कानों में प्रौढ़ युवक अपने बड़े से फोन पर कहता सुनाई दिया ' समझा करो डार्लिंग इलाहाबाद जा रहा हूँ .. बहुत जरूरी है ... कल नहीं तो परसों वापस आ ही जाऊँगा ' अब जलपान को छोड़ बस से उतर कर उसने फिर से बस के गन्तव्य का पता किया । बस कानपुर ही जा रही थी निश्चिन्त होकर उसने सोचा बस में चढ़ेगा तो उन्हें भी बता देगा कि बस कानपुर जा रही इलाहाबाद नहीं । पर जैसे ही बस में चढ़ा प्रौढ़ युवक को कंडेक्टर से कानपुर का टिकट लेते पाया । जलपान और अचरज के साथ वो अपनी सीट पर जाके बैठ गया , उसकी जिज्ञासा प्रौढ़ युवक के प्रति बढ़ गयी थी लेकिन पुरानी सरकारी बस और पुरानी बहुएं आवाज अधिक करती हैं इसलिए उसे फोन का वार्तालाप स्पष्ट समझ नहीं आ रहा था । शहर छोड़ मुख्य सड़क पर आ चुकी बस और सीट पर अभी तक अकेले बैठे उस प्रौढ़ युवक का एक फोन जेब में रख दूसरा निकाल कर बात करना , अनायास ही मुस्काना फिर बड़े फोन पर कुछ टाईप करना सब स्पष्ट कर रहा था । तरुण युवक का मन खिन्न हो गया न जाने क्यों उसे उस अज्ञात ' डार्लिंग ' से हमदर्दी हो रही थी लेकिन वो कर भी क्या सकता था इसी उधेड़बुन के बीच कानो में इयर फोन ठूस कर वो कब सो गया पता नहीं चला और जब गर्मी पसीने की वजह से नींद खुली तो रेलवे क्रासिंग पर बस को खड़ी और प्रौढ़ युवक को बड़े फोन पर ' चालू ' पाया ... अंगड़ाई लेते हुए पानी की बोतल मुंह से लगाई ही थी कि एक क्लास मेट का फोन आ गया ... अब उसकी आँखे चमक उठीं , मुंह में गया पानी झट से अन्दर करते हुए उसने खड़े होकर फोन पिक किया और चिल्लाते हुए बोला ' कानपुर जा रहा हूँ ... कानपुर ... हाँ हाँ कानपुर जा रहा हूँ .. 9 बजे चली थी बस ... कानपुर जा रहा हूँ .. कानपुर ' । अब बस में उसे बड़ी विचित्र नज़रों से देखा जा रहा था , ' पागल कहीं का ' कुछ लोग बुदबुदाए भी पर उसे फर्क नहीं पड़ता ...उसे हिसाब बराबर करना था वो उसने कर लिया । - कौशल ©
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