Wednesday, September 25, 2013

ब्रह्म राक्षस

लावारिस छिन्न भिन्न अधजली अधगली लाशों को ठिकाने लगाता था वो । बस यही उसका काम था । भाव शून्य शब्द शून्य था , किसी ने मुस्कुराते हुए भी नहीं देखा था उसे । लाश ठिकाने लगा कर चेहरे पर श्मशान जैसी वीभत्स शान्ति लिए आता और 50 रूपये और दारू की बोतल लेकर ओझल हो जाता । जुलाई का महीना था नदी में बाढ़ आयी थी बहुत से शरीर बह बह कर आ रहे थे । उसका काम और बढ़ गया था । हमेशा की तरह उस दिन भी आया , पैसे और दारू की बोतल पहले से निकाल कर रखी थी । पैसे उठाकर बोला - दारू की बोतल के बदले पैसे चाहिए ' पार्श्व में उसके ठेले से किसी बच्चे के रोने की आवाज आ रही थी ....©

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