Thursday, September 5, 2013

भूरा - घर के पास ही थी वो बिल्डिंग मैटेरियल्स की दूकान । ' भूरा ' वहीं काम करता था । दिन हो या रात सर्दी हो या गर्मी अपने पुराने साईकिल रिक्शे में वो सीमेंट गिट्टी बालू की बोरियों को आस पड़ोस में डाला करता था । प्लास्टिक की मोटे सोल वाली चप्पलें जिसमें बाएं पैर का तलवा दायें से अधिक घिसा हुआ ,एड़ी से दो इंच ऊपर तक का पैंट और बनियान उसका वेश था । कंधे गले हाथों में सीमेंट और पसीने के कारण उपजी खुजली के जख्म उसके पुरुस्कार थे । ' उस दिन 4 बोरियां लेकर आया धुप थोड़ी तेज थी तो पानी पीकर बरामदे में बैठ गया । ये पूंछने पर कि ऐसा हाल क्यों बनाए रखते हो दिक्कत नहीं होती भूरा ? ... हँसने लगा बोला - का करैं यहै हमार किस्मत हवे । औउर हमार नाम भूरा नाही है बाबूजी लक्ष्मी प्रसाद है , सिलीमेंट ( सीमेंट ) बारू ( बालू ) ढोए ढोए ऊजर ( सफ़ेद ) हुई गा हौं यहै से सब भूरा कहत हैं । ......- मलंग 
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