कल्लू जमादार नहीं रहा । .... अरे ज़मादार था बूढा था इतना सोचना क्यों ? ..... सोंचना पड़ता है भई ... सर्दियों की वो कोहरे वाली सुबह जब हांथ शरीर से अलग नहीं किये जाते तब रजाई में धीमे स्वरे में सुनायी देती उसकी झाडू .. गर्मियों की धूल भरी शाम टूटे सूखे पत्तों के साथ मिल कर पंचम स्वर में गाती उसकी झाडू कर्मंडेय वाधिकारस्ते को चरितार्थ करते हुए बस यही आवाज निकालती थी ' कर .. कर ... कर ... कर ' ©
No comments:
Post a Comment