मंदिर के बाहर वो बूढा रोज बैठता था । मिली हुई टी शर्ट मटमैला पैजामा पहने एक झोली एक झाडू और सरकारी कम्बल की पूंजी समेटे बस वहीं मंदिर की सीढ़ियों में बैठा रहता और एक हाथ किसी दुर्घटना में गवां चूका था फिर भी रोज मंदिर की दहलीज तक झाडू लगाना और आने जाने वालों से राम राम हरि ॐ कहता रहता था , पर मांगना हाथ फैलाना उसकी फितरत में नहीं था । वो ' बाबूजी ' भी 10 बजे के आस पास रोज आते थे। मंदिर के गेट से सीढ़ियों तक लगे पत्थरों में उनका भी नाम लिखा था । मंदिर के गेट पर गाडी खडी करके आते अपने महंगी वाली चप्पलें सीढ़ियों पर उतारते अन्दर जाते दर्शन प्रसाद प्राप्त कर वापस आ जाते । सीढ़ियों पर बैठे भिखारियों से उनका छत्तीस का आंकड़ा रहता था , रोज किसी न किसी को झिडकते सीढियां उतरते थे । बूढ़े से कुछ ख़ास ही चिढ होती थी बात करना देखना तो दूर उसके राम राम का जवाब शायद ही कभी दिया हो । पर आज सीढियां तप रहीं है बाबूजी जैसे तैसे सीढियां उतरते हैं । पर ये क्या आज उनकी चप्पलें गायब हैं बाबूजी बुरा भला कहते हुए आगे जाने की कोशिश करते है पर आज उनके नाम लिखे पत्त्थर ही उनके पैर जला रहे हैं । वो बूढा अपनी फटी चप्पलें आगे करके कहता है बाबूजी ये पहन लीजिये गेट पर उतार दीजियेगा । बाबूजी शब्द शून्य होकर वैसा ही करते हैं .... ©
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