खुले आँगन में तुलसी के पौधे लगे थे और वही भगवान शिव की प्रतीक ' बटइया ' थी । माँ रोज 7-8 के बीच उनका जलाभिषेक करती । दीपक जलाती चन्दन रोली चावल चढ़ाती । थोड़ी देर में न जाने कहाँ से एक गौरैय्या आती और चावल चुन कर फुर्र हो जाती । माँ के संज्ञान में आते ही चावलों की मात्रा एक चुटकी से बढ़ कर एक मुट्ठी हो गयी । अब तो ये हालत थी कि माँ की पूजा से पहले ही वो आ जाती थी । आज 9 बज रहे हैं वो बरामदे में आकर चहक रही है इधर उधर देख रही है । माँ आज पूजा नहीं कर सकती बीमार है पर आज श्रुद्धा के आगे प्रेम की चलेगी । माँ चावल आँगन में डाल देती है । .... ©
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