ठेका देशी शराब ... हां बस उसी ठेके के सामने वो नमकीन का ठेला लगता था । हर पीने वाला उसके यहाँ से नमकीन जरूर लेता । बड़े से बड़ा छोटे से छोटा ,; चोर बदमाश से लेकर सिपाही कोतवाल तक । अपनी एक तिहाई जिन्दगी नशेबाजो के साथ गुजारने के बाद भी वो पीता नहीं था । आये दिन जलालत गालियाँ सहता कभी कभी तो मार भी सहन कर लेता था । बहुत पूंछने पर बोला - भैया जी ये सब चलता रहता है फर्क नहीं पड़ता अब । यही गाली देने वाले पैर छूकर भी जाते अगले दिन । नशा सिर्फ गुमान देता और कुछ नहीं .... दो बिटिया ब्याहनी है लड़का पढ़ रहा है इन सबसे उलझूंगा काम बंद कर दूंगा तो कहाँ से हो पायेगा सब .. यही हमारा धरम करम है । ऐसा लगा मानो साक्षात भगवान कृष्ण आसक्ति भोगों से दूर रह कर कर्म में रत रहने का ज्ञान दे रहे हों । मन आया लगे हाथ पूँछ लूं कि गीता पढी है क्या कभी ? लेकिन तब तक वो प्लेट लेकर आगे बढ़ चूका था । ©
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