Wednesday, September 18, 2013

पहले मैंने 
तुम्हे दिए 
अपने शब्द ,
फिर अर्पित किया 
अपना चिंतन ,
फिर अपनी आस्था भक्ति और विश्वास
 फिर अपनी मुस्कान और दिन 
और अब निछावर कर रहा हूँ 
तुम पर अपनी राते ,
 नींद और सपने । 
जानता हूँ 
बदले में कुछ नहीं मिलेगा । 
पर कम से कम मत मांगना
 मुझसे मेरी साँसे 
वो दो जोड़ी बूढ़ी 
आसराई आँखों की अमानत हैं ... ©

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