उस दिन एक वृद्ध ओवर ब्रिज पर अपने पूरे लदे हाथ ठेले को चढाने का दुर्गम प्रयास कर रहा था । पसीना पसीना हो गया था पर कोशिश जारी थी । फुर्र से एक बाईक ठेले के आगे आकर रुक गई । बाईक से दो नव युवक उतरे और मुस्कुराकर एक ने उस वृद्ध के साथ ठेले को धक्का देना शुरू कर दिया । चढ़ाई चढ़ने पर वृद्ध ने सकुचाते हुए युवक की पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा ' बस भईया अब हम लई जईबे ' । चमत्कार सा हो गया ... एक दिन पहले सिटी कप फ़ुटबाल में मिली सेमीफाईनल की हार का सारा दर्द निकल सा गया उस स्पर्श से ... ईश्वरीय स्पर्श की अनुभूति दे गया वो एक पल ।
( समोSहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योस्ति न प्रिय: ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि तेषु चाप्यहम । ।अ-9 , 29
मैं सभी भूतों में समभाव से व्यापक हूँ न कोई प्रिय है न अप्रिय ; परन्तु जो मुझे प्रेम से भजते है ( प्रेम करते है ) वे मुझमें है और मैं भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट हूँ । ) - कौशल ©
( समोSहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योस्ति न प्रिय: ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि तेषु चाप्यहम । ।अ-9 , 29
मैं सभी भूतों में समभाव से व्यापक हूँ न कोई प्रिय है न अप्रिय ; परन्तु जो मुझे प्रेम से भजते है ( प्रेम करते है ) वे मुझमें है और मैं भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट हूँ । ) - कौशल ©
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