वृक्ष जिसने प्राण वायु के साथ साथ कई बसंतों फल फूल छाया दी पंछियों , कीड़ों , गिलहरियों की अनगिनत पुश्तों को आश्रय दिया पर अब सूख चूका है उसकी डालों पर न पंछी कलरव करते हैं न गिलहरियाँ फुदकती है ; उसकी ही भांति हो गए थे वो । जर्जर शरीर एक कदम चलने के लिए साँसों , शरीर और छड़ी का पूरा जोर लगाना पड़ता था उन्हें , पर थे नियमित । उन्हें देखकर किसी को भी लग सकता था कि अब इस आयु में ये क्यों खुद को कष्ट देते हैं ? पर वो प्रतीक हैं संकल्प के , आशा के , जीवन के... वो जीवन जो किसी भी दिन ख़त्म हो सकता है , पर वो इसे हार कर नहीं ... जी कर , लड़ कर ख़त्म होने देना चाहते । - कौशल त्रिपाठी ©
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