नदी किनारे अक्सर जाना होता है । इस बार महीने भर बाद गया तो पाता हूँ कि बाढ़ का पानी लौट चुका है। मिट्टी के गहरे टीले फिर से हरे भरे हो चुके है । झींगुरों का कंसर्ट अपने चरम पर है । पत्ते पेड़ सब चटक हरे हो गए है ... मिट्टी कीचड से सनी भैंसें कैट वाल्क को भी लजाती हुई चाल से घर लौट रही है ... तभी में में में करती एक आवाज कानो में पडी । आवृत्ति बढ़ती ही जा रही थी । उठ कर देखा तो एक ऊंचे टीले पर एक बकरी मिमिया रही थी । हरे भरे टीले में घास खाते खाते वो टीले के ऊपर पहुँच चुकी थी । अब शायद उतरने का रास्ता नही सूझ रहा था उसे । ' इच्छा पूर्ति के लिए विवेक को तिलांजलि देने से ऐसी ही परिणति होती ' उसकी बेबस मिमियाहट यही कह रही थी शायद .....
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