रात
हवन के लिये आम की लकडियां लेने गया था । लकडी की टाल / आरा मशीन चलाने
वाले मुस्लिम हैं । रात में गया था तो अंधेरा भी हो गया था जनाब ने पहले
नौकर से कहा फ़िर खुद नौकर के साथ उठ कर लकडी देने लगे । लकडी लेने के बाद
जब मैने उनसे कहा कि - भईया पैसे बताईये ? .. तो उन्होने कहा - हवन के
लिये लकडियों के पैसे हम नहीं लेंगे । .......... देने वाले इसे जो मन आये
वो रूप देगें पर ... सामाजिक समरसता का इससे बडा उदाहरण क्या होगा कि कि
मुस्लिम एक काफ़िर की पूजा के लिये खुद लकडियां देता है और कीमत भी नहीं
लेता । ... मुझे गर्व है कि मैं ऐसे भारत में रहता हूं ।
No comments:
Post a Comment