Tuesday, October 8, 2013

मैं लिखना नहीं चाहता
मैं छपना भी नहीं चाहता 
किताबो में 
अखबारों में 
इतिहास में 
तोड़ देना चाहता हूँ अपना कलम 
उकेरना चाहता हूँ 
खुद को अपनी उँगलियों से
माँ के तलवे पर 
तुम्हारी अधरों पर
नन्ही हथेलियों पर
गाय के गले पर 
नदी की धारा पर 
सुबह की गीली घास पर
लहर बहा कर ले जाए उस रेत पर
कीचड पर मिट्टी पर 
पुष्प की पंखुड़ी पर
बबूल के शूल पर 
पसीने से भीगे श्रमजीवी के अंगोछे पर 
किसान के हंसिए पर
जमादार की झाडू पर
भंगिन के मैला उठाने वाले तसले पर
पत्थर पर 
रोटी पर 
धुल से सनी खिडकियों पर 
और चिता की राख पर .....
©


4 comments:

  1. सुन्दर कविता! पर उकेरना चाहता हूँ से जगी उत्सुकता को शांत करती एक पंक्ति यदि अंत में होती कि क्या उकेरना चाहता है कवि, तो और भी सुन्दर हो जाती कविता. ध्र्ष्टता के लिए क्षमा चाहूंगी.

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  2. कविता पढ़ने व प्रतिक्रिया देने का धन्यवाद । प्रतिक्रियाओं जिज्ञासाओं को मैं धृष्टता नहीं मानता इसलिए अपराध बोध से निश्चिन्त रहिये । और अब मूल बात ' कविता को पुनः समय देकर पढ़िए ' आपकी जिज्ञासा अवश्य शांत होगी ।

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  3. मैंने फिर से पढ़ा. जिज्ञासा अब भी वही है. छपने या लिखने का अभिप्राय स्पष्ट है पर क्या उकेरना चाहता है कवि, कोई चित्र या शब्द, ये समझ नहीं आता.

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  4. ' उकेरना चाहता हूँ
     खुद को अपनी उँगलियों से ' .... जिन पर कवि स्वयं को उकेरना चाहता वो किसी न किसी चीज / भावना के प्रतीक है । उकेरना से आशय कवि का उनमे अंगीकार होने की इच्छा रखने से है क्योकि कवि उनमे स्वयं को पाता है ।

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    बारहवीं की हिन्दी की परीक्षा याद दिला दी आपने । सन्दर्भ सहित व्याख्या लिखे बहुत समय हो गया... :)

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