Saturday, January 4, 2014

अम्बेडकर पार्क , फैजाबाद रोड और गोमती नगर के बीच का इलाका  , बड़ी चौड़ी सडको का मकड़जाल , भूल से गलत लेन में घुस आना और तो और हेलमेट और कान के बीच फंसे फोन से बार बार यही शब्द ' अरे जल्दी आओ , मुझे बुला के खुद कहाँ घूम रहे ' .... बड़ी आफत थी रास्ता पूंछने के लिए भी कोई नहीं दिख रहा या कहूं रुक रहा था । दूर सड़क के उस छोर पर एक स्कूटी खड़ी दिखी तो बाईक दौड़ा दी , एक मैडम पुल के किनारे थी (शायद )फोन पर बात कर रही थी ... हम जैसे गांव देहात वालों से न जाने क्यों excuse me नहीं कहा जाता .... तो सीधे ' सुनिए मैडम ये फन वेव्स किधर पड़ता ' बोल दिया .... उनके ईशारे नहीं समझा तो बेझिझक बोला ' जी समझा नहीं ' .... थोडा पास आकर उन्होंने बाकायदा दायें बाएं करके समझा दिया ... शुक्रिया बोलने को उनकी तरफ गौर से देखा तो नजरें थम गयीं जबान जम गयी... आखें आंसुओं से भरी थी उनकी ... वाह रे औरत अपना दुःख रोक कर भी मदद करने चली आई ... पूंछने को हुआ ही था कि ' कोई परेशानी है ?  कोई मदद कर सकता हूँ ' पर फोन पर 'वो ' बोल उठी ' पता पूंछने को मैडम ही मिली थी ... जल्दी आओ ' .... बाईक मोड़ कर दौड़ा दी वो मिली बड़ा हसीं सुकून देने वाला पल था ... पर अगले दिन अखबार सीने में नश्तर चुभा रहा था ' गोमती में युवती की लाश मिली ' छपा था ... ©

1 comment:

  1. बहुत ही भावपूर्ण है!

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