रुद्र का आह्वान करता रक्त में उबाल दो ,
भस्म कर दो सब मलिनता वर हमें महाकाल दो ।
हर प्रताडित के हृदय की हाय अब गर्जन बने ,
आंख से बहते हुये अश्रु लावा बन बहे ।
भीम की ललकार हो हर दबी शोषित जुबान ,
द्वेष की लंका जलाने अंजनी का लाल दो ।।
ओ दया के सिन्धु सुन लो हमारी ये पुकार ,
इस विपद वेला मे जन करते गुहार ।
अज्ञानता के तिमिर का नाश करने के लिये ,
तप , ज्ञान , बुद्धि विवेक की तुम ज्वलित एक मशाल दो ।।
हैं मनुज हम जिनने मापी सिन्धु की गहराईयां ,
छू चुके हम अपने बूते ब्रहाण्ड की ऊंचाईयां ।
एक हार से टूटे नही , आगे बढे चलते रहें ,
पराजय यज्ञ के विध्वंस को तुम वीरभद्र विकराल दो ।।
ध्येय पथ पर हमारे शूल है बिखरे पडे ,
प्रबल सरिता , दुरुह गिरि मार्ग को अवरुद्ध करे ।
अटल विस्वास के स्वर में विजय के गीत हम गाते रहें ,
संकटो के उर मे धसाने राणा प्रताप का भाल दो ।।
रुद्र का आह्वान करता रक्त में उबाल दो ,
भस्म कर दो सब मलिनता वर हमें महाकाल दो ।
©
.............कब यहां अमर विस्वास , अमिट है कब आस्था ? बस एक शून्य जिसमें होता सब कुछ विलीन , आबद्ध परिस्थिति - मनोवृत्ति की सीमा से , मै जो लिखता वह सब कितना अर्थहीन !
Thursday, April 8, 2010
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कविता
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शब्द ही नहीं हैं....तारीफ़ को....बहुत बहुत उम्दा....:)
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